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Wednesday, 8 June 2016

उष्टासन

उष्टासन यानी उंट के समान मुद्रा. इस आसन का अभ्यास करते समय शरीर की उंट के समान प्रतीत होता है अत: इसे उष्टासन कहते हैं. आइये जानें इस आसन का अभ्यास किस प्रकार किया जाना चाहिए एवं इसके क्या लाभ है.
उष्टासन के लाभ – Benefits of Ustrasana
उष्टासन शरीर के अगले भाग को लचीला एवं मजबूत बनाता है. इस आसन से छाती फैलती है और फेफड़ों की कार्य क्षमता में बढ़ोत्तरी होती है. मेरूदंड एवं पीठ को मजबूत एवं सुदृढ़ बनाये रखने के लिए भी इस आसन का अभ्यास लाभप्रद होता है. जंघाओं में मौजूद तनाव को दूर करने में भी यह आसन सहायक होता है.
उष्टासन अवस्था – Ustrasana Technique
इस आसन में जब आप शरीर को पीछे की ओर खींचते हैं उस समय जंधाओं को ज़मीन के लम्बवत रखने की कोशिश करनी चाहिए. आसन के क्रम में सिर को पीछे झुकाने से गर्दन में तनाव हो सकता है अत: सिर को पीछे की ओर नहीं झुकाना चाहिए. अगर गर्दन में तनाव महसूस हो तो  ठोढ़ी को छाती से लगा सकते हैं. जब आसन से वापस लौट रहे हो उस समय गर्दन को आरामदायक स्थिति में रखते हुए शरीर के ऊपरी भाग को उठाना चाहिए फिर सिर को सीधा करना चाहिए. अभ्यास के क्रम में अगर घुटनों में पीड़ा महसूस हो तो आप घुटनों एवं पैरों के नीचे कम्बल मोड़ कर रख सकते हैं.
सावधानियां
इस आसन का अभ्यास उस स्थिति में नहीं करना चाहिए जबकि आप हर्नियां से पीड़ित हों. गर्दन एवं कंधों में तकलीफ होने पर इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए. कमर व घुटनों में पीड़ा होने पर भी इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.
योग क्रिया  – Ustrasana Yoga Step by Step
  • स्टेप 1 घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ जाएं. हिप्स को थोड़ा फैलाएं और पैर की उंगलियों को अंदर की ओर मोड़ें.
  • स्टेप 2 हाथों को कमर पर रखें. इस अवस्था में उंगलियां ज़मीन की ओर होनी चाहिए.
  • स्टेप 3 जंघाओं और पेडु को आगे की ओर दबाएं.
  • स्टेप 4 छाती को फुलाकर सांस लें. मेरूदंड को सीधा तान कर रखें.
  • स्टेप 5 कंधों और बांहों को पीछे की ओर ले जाएं.
  • स्टेप 6 छाती को ऊपर उठाएं और शरीर के ऊपरी भाग को पीछे की ओर मोड़ें.
  • स्टेप 7 सिर को सीधा रखें और सामने देखें. गर्दन सीधा तान कर रखें.
  • स्टेप 8 दाएं हाथ को दाएं पैर पर ले जाएं. और हथेलियों को टखनों अथवा ऐड़ियों पर रखें.
  • स्टेप 9 बांए हाथ को से बाएं टखनों अथवा ऐड़ियों को पकड़ें.
  • स्टेप 10 गर्दन को उठाएं और सिर को पीछे झुकाकर छत की ओर देखें.
  • स्टेप 11 इस मुद्रा में 30 सेकेण्ड से 1 मिनट तक बने रहें.
  • स्टेप 12 धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं.

हलासन

हलासन में शरीर को हल की मुद्रा में रखा जाता है.इस आसन के लिए शरीर का लचीला होना बहुत आवश्यक होता है.इस आसन का अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए एवं यह किस प्रकार लाभप्रद होता है आइये इसे देखें.
हलासन के लाभ – Benefits of Halasana
हलासन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डियां लचीली रहती है.वृद्धावस्था में हड्डियों से सम्बन्धित कई प्रकार की परेशानियों से बचने के लिए भी यह आसन बहुत ही उपयुक्त होता है.यह आसन पेट सम्बन्धी रोग, थायराइड, दमा, कफ एवं रक्त सम्बन्धी रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी होता है.तंत्रिका तंत्र एवं लीवर से सम्बन्धित परेशानियों में भी यह आसन कारगर होता है.मानसिक क्षमताओं को बढ़ाने के लिए भी यह आसन बहुत ही उत्तम होता है.
हलासन अवस्था  – Halasana Technique
हलासन का अभ्यास करते समय सिर को मेरूदंड की सीध में रखना चाहिए.आसन के क्रम में जंघाओं से तनाव को कम करने के लिए आप चाहें तो जितना आराम पूर्वक पैरों को फैला सकते हों दोनों तरफ फैलाएं.हलासन के पश्चात रिलैक्स के लिए मत्स्य आसन का अभ्यास करना चाहिए.
सावधानी
इस आसन का अभ्यास उस समय नहीं करना चाहिए जबकि आपकी गर्दन और कंधो में किसी प्रकार की परेशानी हो.हृदय रोग एवं रक्तचाप सम्बन्धी परेशानियों में भी इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.रजोधर्म के समय स्त्रियों को इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.
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योग क्रिया  – How to do Halasana Step by Step
  • स्टेप 1 पीठ के बल भूमि पर लेट जाएं.
  • स्टेप 2 पैरों को मोड़ें और पैर की उंगलियों को सिर के पीछे ज़मीन से टिकाएं.
  • स्टेप 3 पैरों को सीधा करते हुए ऐड़ियों को शरीर से दूर ले जाने की कोशिश करें.
  • स्टेप 4 बांहों को ज़मीन पर टिकाए रखें.हथेलियां ज़मीन की दिशा में रहनी चाहिए.
  • स्टेप 5 इस मुद्रा में 30 सेकेण्ड से 2 मिनट तक बने रहें.
  • स्टेप 6 कमर पर हाथ को रखें और धीरे धीरे वापस सामान्य स्थिति में लौट आएं.
विधि
पहले पीठ के बल भूमि पर लेट जाएँ.एड़ी-पंजे मिला लें.हाथों की हथेलियों को भूमि पर रखकर कोहनियों को कमर से सटाए रखें.अब श्वास को सुविधानुसार बाहर निकाल दें.फिर दोनों पैरों को एक-दूसरे से सटाते हुए पहले 60 फिर 90 डिग्री के कोण तक एक साथ धीरे-धीरे भूमि से ऊपर उठाते जाएँ।
घुटना सीधा रखते हुए पैर पूरे ऊपर 90 डिग्री के कोण में आकाश की ओर उठाएँ.फिर हथेलियों को भूमि पर दबाते हुए हथेलियों के सहारे पैरों को पीछे सिर की ओर झुकाते हुए पंजों को भूमि पर रख दें.अब दोनों हाथों के पंजों की संधि कर सिर से लगाए.फिर सिर को हथेलियों से थोड़-सा दबाएँ, जिससे आपके पैर और पीछे की ओर जाएँ।
इसे अपनी सुविधानुसार जितने समय तक रख सकते हैं रखें, फिर धीरे-धीरे इस स्थिति की अवधि को दो से पाँच मिनट तक बढ़ाएँ।

सर्वांगासन और अर्ध सर्वांगासन योग

सर्वांगसन दो प्रकार के होते हैं सर्वांगासन और अर्धसर्वांगासन.इस आसन में भूमि पर पीठ के बल लेटकर शरीर को ऊपर उठाया जाता है अत: इसे सर्वांगासन के नाम से जाना जाता है.
सर्वांगासन के लाभ – Benefits of Sarvangasana Yoga
सर्वांगासन के अभ्यास से पाचनतंत्र दुरूस्त रहता है.भूख बढ़ती है और स्वास्थ्य अच्छी रहती है.सर्वांगासन से बौद्धिक क्षमता बढ़ती है.बालों को गिरना और जल्दी सफेद होना कम होता है.त्वचा जल्दी ढ़ीली नहीं होती है.यह आसन नेत्र और मस्तिष्क के रोगों में भी कारगर होता है.इस आसन से शरीर के सभी अंग पुष्ट होते हैं.यह थायराइड ग्रंथि और मेरूदंड पर सकारात्मक प्रभाव डालता है.थायराईड ग्रंथि के सुचारू पर्वक कार्य करने से शरीर का तापमान और उपापचय क्रिया संतुलित होता है.
सर्वांगासन अवस्था – Sarvangasana Yoga Posture and Technique
इस आसन का अभ्यास करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि सिर सीधा रहे.आसन के क्रम में सिर को घूमाना नहीं चाहिए.पैरों को एक साथ और रिलैक्स रखना चाहिए.आसन करते समय अगर पैरों में कष्ट या परेशानी महसूस हो तो वापस सामान्य स्थिति में लौटकर फिर से आसन का अभ्यास करना चाहिए.अगर इस आसन में आपको बहुत अधिक कठिनाई महसूस हो रही है तो आप इसके बदले अर्धसर्वांगासन, विपरीत करनी योग मुद्रा का अभ्यास कर सकते हैं.इन आसनों के अभ्यास से शरीर लचीला होने लगेगा जिससे कुछ दिनो के बाद आप सर्वांगसन का अभ्यास आपके लिए अधिक कठिन नहीं होगा.
सावधानी
रक्तचाप एवं हृदयरोग से पीड़ित लोगों को इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.स्त्रियों को मासिक के समय इस आसन का अभ्यास नहीं करना चाहिए.गर्दन अथवा कंधों में कष्ट होने पर भी इस आसन का अभ्यास करना ठीक नहीं होता.
योग क्रिया – Sarvangasana Yoga Step by Step
  • स्टेप 1 पीठ के बल लेट जाएं.पैर शरीर से दूर और एक साथ होने चाहिए.
  • स्टेप 2 बांहें शरीर के दोनों तरफ और हथेलियां ज़मीन की दिशा में होनी चाहिए.
  • स्टेप 3 हथेलियों से जमीन को दबाएं और दोनों पैरो को छत की सीधा में सीधा उठाएं.
  • स्टेप 4 हिप्स और कमर को ज़मीन से ऊपर उठाएं.
  • स्टेप 5 कोहनी को मोड़ें और हाथों को कमर पर रखें.
  • स्टेप 6 शरीर को सहारा देने के लिए कोहनी और बांहों से ज़मीन को दबाए रखें.
  • स्टेप 7 कोहनियो को जहां तक संभव हो एक दूसरे के करीब लाने की कोशिश करें.
  • स्टेप 8 हाथों से शरीर को सहारा देकर ऊपर उठाने की कोशिश करें.
  • स्टेप 9 जहां तक संभव हो पीठ को सीधा रखें.
  • स्टेप 10 इस मुद्रा में 30 सेकेण्ड से 3 मिनट तक बने रहें.
  • स्टेप 11 धीरे धीरे सामान्य स्थिति में लौट आएं.

अर्ध सर्वांगसन Ardha Sarvangasana Yoga

सर्वांगसन की एक दूसरी मुद्रा है अर्धसर्वांगसन.जिन लोगों को सर्वांगसन का अभ्यास कठिन महसूस होता है वे इस आसन का अभ्यास कर सकते हैं.इस आसन के अभ्यास से शरीर लचीला होता है जिससे सर्वांगासन में कठिनाई नहीं आती है.इस आसन का अभ्यास किस प्रकार करना चाहिए एवं इसके क्या लाभ हैं आइये इसे देखते हैं.
अर्ध सर्वांगसन के लाभ – Benefits of Ardha Sarvangasana Yoga
इस आसन से गर्दन और कंधों का व्यायाम होता है जो रक्त संचार को सुचारू बनाने में कारगर होता है.इस आसन का अभ्यास अनिद्रा एवं निराशात्मक विचारों को दूर करने में भी सहायक होता है.अर्ध सर्वांगासन से मनसिक शांति और मेधा शक्ति का विकास होता है.
अर्ध सर्वांगासन अवस्था – Ardha Sarvangasana Yoga Posture and Technique
अर्ध सर्वांसान का अभ्यास करते समय अगर कठिनाई महसूस हो रही हो तो शरीर को लचीला बनाने के लिए आपको उन योग मुद्राओं का अभ्यास करना चाहिए जिनसे मेरूदंद, कमर, घुटनों एवं एड़ियों में पर्याप्त लचक पैदा हो सके.विपरीत करनी आसन इस संदर्भ में उपयुक्त योग मुद्रा है.इस आसन का अभ्यास करते समय पैरों में संतुलन बनाये रखने के लिए विशेष बल का प्रयोग नहीं करना चाहिए.आसन के क्रम में आपको पूरी तरह से रिलैक्स महसूस करना चाहिए.
सावधानियां
इस आसन का अभ्यास उन लोगों को नहीं करना चाहिए जो उच्च रक्त चाप से पीड़ित हैं.गर्दन में कष्ट होने पर इस योग मुद्रा का अभ्यास नहीं करना चाहिए.नेत्र रोग वालों को भी इस योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए.अगर अभ्यास करना हो तो किसी विशेषज्ञ की देख रेख में करें.मासिकधर्म के समय महिलाओं को इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए.
योग क्रिया – Ardha Sarvangasana Yoga Step by Step
  • स्टेप 1 पीठ के बल लेट जाएं.इस अवस्था में घुटने मुड़े हुए हों और तलवे जमीन पर टिके हुए हों.
  • स्टेप 2 बांहें शरीर के दोनों तरफ हों, और हथेलियां ज़मीन की ओर हों.
  • स्टेप 3 घुटनों को छाती से लगाएं.
  • स्टेप 4 हथेलियों को ज़मीन की ओर दबाएं.
  • स्टेप 5 हिप्स को ज़मीन से उठाएं.
  • स्टेप 6 कोहनी को मोड़ें और हाथों को कमर पर रखें.
  • स्टेप 7 शरीर को सहारा देने के लिए कोहनी और बांहों से ज़मीन को दबाए रखें.
  • स्टेप 8 पैरों को शरीर से 45 डिग्री पर सीधा करके रखें.
  • स्टेप 9 इस मुद्रा में 30 सेकेण्ड से 3 मिनट तक बने रहें.

ध्यान मुद्रा-

ध्यान या 'समाधि मुद्रा हाथों द्वारा बनाई गई ऐसी भाव-भंगिमा है जो ध्यान करने की ऊर्जा, गहन चिंतन शक्ति तथा ऊर्जा के उच्च स्तर तक पहुंचाती है। बाएं हाथ की हथेली पर दाएं हाथ को रखकर जो ध्यान की मुद्रा बनती है उसे 'ध्यान मुद्रा कहते हैं। जिसको भी ध्यान में अधिक समय तक बैठना है उसके लिए यह ध्यान मुद्रा उचित है। भगवान बुद्ध व महावीर की कई मूर्ति आपने इस मुद्रा में देखी होगी। इस मुद्रा में व्यक्ति गहन आध्यात्मिक शांति व शांतचित्त होने की ऊर्जा प्राप्त करता है। बुद्ध की इस मुद्रा में उपलब्ध मूर्ति को ध्यान कक्ष, आपके पूजाघर या फिर घर के केंद्र या अध्ययन कक्ष में लगाया जाना चाहिए। 

ध्यान योग का महत्वपूर्ण तत्व है जो तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है. ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केन्द्रित होती है. उर्जा केन्द्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल (inner strength) बढ़ता है.
योग में ध्यान का बहुत ही महत्व है.  ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केन्द्रित होती है.  उर्जा केन्द्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल (inner strength) बढ़ता है.  ध्यान से वर्तमान को देखने और समझने में मदद मिलती है.  वर्तमान में हमारे सामने जो लक्ष्य है उसे प्राप्त करने की प्रेरण और क्षमता भी ध्यान से प्राप्त होता है. 
योग में ध्यान का महत्व (importance of meditation in Yoga)
ध्यान को योग की आत्मा कहा जाता है.  प्राचीन काल में योगी योग क्रिया द्वारा अपनी उर्जा को संचित कर आत्मिक एवं पारलौकिक ज्ञान और दृष्ट प्राप्त करते थे.  वास्तव में ध्यान योग का महत्वपूर्ण तत्व है जो तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है और उसे बल प्रदान करता है.  हमारे मन में एक साथ कई विचार चलते रहते हैं.  मन में दौड़ते विचरों से मस्तिष्क में कोलाहल सा उत्पन्न होने लगता है जिससे मानसिक अशांति पैदा होने लगती है.  ध्यान अनावश्यक विचारों को मन से निकालकर शुद्ध और आवश्यक विचारों को मस्तिष्क में जगह देता है.  ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती और मानसिक शांति की अनुभूति होती है.  ध्यान का अभ्यास करते समय शुरू में 5 मिनट भी काफी होता है.  अभ्यास से 20-30 मिनट तक ध्यान लगा सकते हैं. 
ध्यान की तैयारी (Preparing for meditation)
आज की भाग दौड़ भरी जिन्दग़ी में मन को एकाग्र कर पाना और ध्यान लगाना बहुत ही कठिन है.  मेडिटेशन यानी ध्यान की क्रिया शुरू करने से पहले वातावरण को इस क्रिया हेतु तैयार कर लेना चाहिए.  ध्यान की क्रिया उस स्थान पर करना चाहिए जहां शांति हो और मन को भटकाने वाले तत्व मौजूद नहीं हों.  ध्यान के लिए एक निश्चित समय बना लेना चाहिए इससे कुछ दिनों के अभ्यास से यह दैनिक क्रिया में शामिल हो जाता है फलत ध्यान लगाना आसान हो जाता है. 
ध्यान और  आसन का  महत्व (Importance of stance for meditation)
आसन में बैठने का तरीका ध्यान में काफी मायने रखता है.  ध्यान की क्रिया में हमेशा सीधा तन कर बैठना चाहिए.  दोनों पैर एक दूसरे पर क्रास की तरह होना चाहिए और आंखें मूंद कर नेत्र को मस्तिष्क के केन्द्र में स्थापित करना चाहिए.  इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस क्रिया में किसी प्रकार का तनाव नहीं हो और आपकी आंखें स्थिर और शांत हों.  यह क्रिया आप भूमि पर आसन बिछाकर कर सकते हैं अथवा पीछे से सहारा देने वाली कुर्सी पर बैठकर भी कर सकते हैं. 
सांस की गति का महत्व (Significance of breathing rate)
योग में सांस की गति को आवश्यक तत्व के रूप में मान्यता दी गई है.  सांस लेने और छोड़ने की क्रिया द्वारा ध्यान को केन्द्रित करने में मदद मिलती है.  ध्यान करते समय जब मन अस्थिर होकर भटक रहा हो उस समय श्वसन क्रिया पर ध्यान केन्द्रित करने से धीरे धीरे मन स्थिर हो जाता है और ध्यान केन्द्रित होने लगता है.  ध्यान करते समय गहरी सांस लेकर धीरे धीरे से सांस छोड़ने की क्रिया से काफी लाभ मिलता है. 
ध्यान और अन्तर्दृष्टि (Meditation and insight)
ध्यान करते समय अगर आप उस स्थान को अपनी अन्तर्दृष्टि से देखने की कोशिश करते हैं जहां जाने की आप इच्छा रखते हैं अथवा जहां आप जा चुके हैं और जिनकी खूबसूरत एहसास आपके मन में बसा हुआ है तो ध्यान आनन्द दायक हो जाता है.  इससे  ध्यान मुद्रा में बैठा आसान होता एवं लम्बे समय तक ध्यान केन्द्रित करने में भी मदद मिलती है.  अपनी अन्तर्दृष्टि से आप मंदिर, बगीचा, फूलों की क्यारियों एवं प्राकृतिक दृष्यों को देख सकते हैं. 

भूमिस्पर्श मुद्रा


इस मुद्रा में पृथ्वी का स्पर्श या आह्वान किया जाता है। इस मुद्रा में हमेशा सीधा हाथ भूमि को स्पर्श करता दिखता है जबकि बायां हाथ गोद में रखा जाता है। बुद्ध की इस मुद्रा के बारे में कहा जाता है कि जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी तो वे इस मुद्रा में आसीन थे। ये मुद्रा असीम शक्ति और सत्य व ज्ञान प्राप्ति के प्रति बुद्ध के समर्पण का प्रतिनिधित्व करती है। इस ऊर्जा के सहारे ही बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हो पाई थी तथा ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में आ रही बाधाओं से संघर्ष करने व अज्ञान के अंधकार से लडऩे में सहायता मिली थी। बुद्ध की इस मुद्रा की प्रतिमा को आप घर के केंद्र, मुख्य द्वार या फिर पूजाघर या किसी पवित्र स्थल पर लगा सकते हैं। 


भय भगाए अभय मुद्रा

downloadजैसा की इसके नाम से ही विदित होता है कि यह अभय प्रदान करती है इसीलिए इसका नाम अभय मुद्रा है। अभय और ज्ञान मुद्रा एक साथ की जा सकती है।
आपने भगवान के चित्रों में उन्हें आशीर्वाद देते हुए देखा ही होगा, वही अभय मुद्रा है। अँगुठे और तर्जनी अँगुली मिलाकर भी अभय मुद्रा की जाती है और आशीर्वाद की मुद्रा भी अभय मुद्रा कही जाती है।
विधि- सर्वप्रथम किसी भी सुखासन में बैठकर अपने दोनों हाथों की हथेलियों को सामने की ओर करते हुए कंधे के पास रखते हैं। ज्ञान मुद्रा करते हुए आँखों को बंद कर गहरी श्वास लें और छोड़ें और शांति तथा निर्भिकता को महसूस करें। यही है अभय मुद्रा। इसे अभय ज्ञान मुद्रा भी कहते हैं।
लाभ- इस मुद्रा का निरंतर अभ्यास करने से मन में किसी भी तरह का भय नहीं रहता। इससे मन में शांति, निश्चिंतता और परोपकार का जन्म होता है। व्यक्ति खुद के भीतर शक्ति और शांति को महसूस करता है।

Saturday, 4 June 2016

पश्चिमोत्तानासन : पाचन शक्ति बढ़ाने वाला आसन

पश्चिम अर्थात पीछे का भाग- पीठ। पीठ में खिंचाव उत्पन्न होता है, इसीलिए इसे पश्चिमोत्तनासन कहते हैं। इस आसन से शरीर की सभी माँसपेशियों पर खिंचाव पड़ता है। पशिच्मोत्तासन आसन को आवश्यक आसनों में से एक माना गया है। शीर्षासन के बाद इसी आसन का महत्वपूर्ण स्थान है। इस आसन से मेरूदंड लचीला बनता है, जिससे कुण्डलिनी जागरण में लाभ होता है। यह आसन आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। पशिच्मोत्तासन के द्वारा मेरूदंड लचीला व मजबूत बनता है जिससे बुढ़ापे में भी व्यक्ति तनकर चलता है और उसकी रीढ़ की हड्डी झुकती नहीं है। यह मेरूदंड के सभी विकार जैसे- पीठदर्द, पेट के रोग, यकृत रोग, तिल्ली, आंतों के रोग तथा गुर्दे के रोगों को दूर करता है। इसके अभ्यास से शरीर की चर्बी कम होकर मोटापा दूर होता है तथा मधुमेह का रोग भी ठीक होता है। यह आसन स्त्रियों के लिए भी लाभकारी है। इस योगासन से स्त्रियों के योनिदोश, मासिक धर्म सम्बन्धी विकार तथा प्रदर आदि रोग दूर होते हैं। यह आसन गर्भाशय से सम्बन्धी शरीर के स्नायुजाल को ठीक करता है।


विधि ----
1. जमीन पर चटाई या दरी बिछाकर इस आसन का अभ्यास करें। चटाई पर पीठ के बल लेट जाएं और अपने दोनों पैर को फैलाकर रखें। दोनों पैरों को आपस में परस्पर मिलाकर रखें तथा अपने पूरे शरीर को बिल्कुल सीधा तान कर रखें। 
2. दोनों हाथों को सिर की ओर ऊपर जमीन पर टिकाएं। अपने दोनों हाथों को ऊपर की ओर उठाते हुए एक झटके के साथ कमर के ऊपर के भाग को उठा लें। इसके बाद धीरे-धीरे अपने दोनों हाथों से पैरों के अंगूठों को पकड़ने की कोशिश करें। ऐसा करते समय पैरों तथा हाथों को बिल्कुल सीधा रखें। 
3. अगर आपको लेट कर यह आसन करने में परेशानी हो तो, इस आसान को बैठे बैठे भी किया जा सकता है। यह करते समय अपनी नाक को छूने की कोशिश करें। इस प्रकार यह क्रिया 1 बार पूरी होने के बाद 10 सैकेंड तक आराम करें और पुन: इस क्रिया को दोहराएं इस तरह यह आसन 3 बार ही करें। इस आसन को करते समय सांस सामान्य रूप से ले और छोड़ें। 

लाभ-----
- इस आसन से शरीर की वायु ठीक रूप से काम करती है और आध्यात्मिक उन्नति होती है। 
- जिस व्यक्ति को क्रोध अधिक आता हो उसे यह आसन करना चाहिए। 
- इस से पूरे शरीर में खून का बहाव सही रूप से होता है। जिससे शरीर की कमजोरी दूर होकर शरीर सुदृढ़, स्फूर्तिदायक और हमेशा स्वस्थ रहता है। 
- इस आसन को करने से बौनापन दूर होता है। 
- पेट की चर्बी को कम करता है तथा नितम्बों का मोटापा दूर कर सुडौल बनाता है। 
- यह आसन सफेद बालों को कम करके उन्हे काले व घने बनाता है।
- इसके अभ्यास से गुर्दे की पथरी, बहुमूत्र (जो मुख्य रूप से पैन्क्रियाज के कारण होता है) दूर होता है तथा यह बवासीर आदि रोगों में भी लाभकारी है। 
- यह आसन वीर्य दोष को दूर करता है तथा कब्ज को दूर कर मल को साफ करता है।
- यह आसन साइनस के साथ-साथ अनिद्रा के उपचार में भी फायदेमंद है। साइनसाइटिस के दौरान सिरदर्द से आराम के लिए भी इसका काफी महत्व है।